विवाह का “योग” हर व्यक्ति की कुंडली में अलग-अलग तरह से बनता है। कई बार जीवनसाथी मिलने मे देरी हो जाती है। बात अधूरी रह जाती है। या मन ही मन तैयारियाँ होते हुए भी तारीख तय नहीं हो पाती।
ज्योतिष के दृष्टिकोण से इसकी ठोस वजह कुंडली में दिखाई देती हैं—खासतौर पर सप्तम भाव, उसके स्वामी, दशा-अन्तर्दशा, और शुभ/पाप ग्रहों का प्रभाव। आइए, उन सात वास्तविक कारणों को सरल भाषा में समझें जिनसे विवाह में देरी दिखती है।
विवाह का मूल संकेत सप्तम भाव (7th house) और उसका स्वामी देता है।
शनि स्वभाव से विलंबकारी (delay-giver) माना गया है। इसका मतलब हमेशा “नकारात्मक” नहीं—कई बार शनि देरी कराता है ताकि संबंध परिपक्व होकर टिकाऊ बने। शनि को अगर समझो तो तुम जो चाहोगे वो हासिल कर पाओगे, लेकिन शनि को समझना मुश्किल है।
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विवाह/संबंधों की आकर्षण-शक्ति, सौम्यता और सहमति का बड़ा भाग शुक्र से, और समझ-दया-समर्पण का बड़ा भाग गुरु से समझा जाता है (आधुनिक दृष्टि में दोनों ही सभी जातकों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं)।
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राहु-केतु परिवर्तन और गलतफहमियों के कारक हैं; जब ये लग्न-सप्तम (1–7) धुरी को प्रभावित करते हैं, तो सम्बन्धों में धुंध, भ्रम, बाहरी अड़चनें, या अप्रत्याशित उलट-फेर आ सकते हैं।
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मंगल ऊर्जा और दृढ़ता देता है, पर संबंध-भावों पर अत्यधिक कठोर पड़ने से टकराव/जल्दबाजी/रूखापन ला सकता है।
कई बार कुंडली मज़बूत होती है, पर समय साथ नहीं देता। विवाह के संकेत तभी साकार होते हैं जब संबंधित दशा-अन्तर्दशा सक्रिय हो और गोचर समर्थन करें।
विवाह की स्थिरता/समाज-सम्मुख रूप के लिए उपपद लग्न (UL) महत्त्वपूर्ण संकेतक है, वहीं संबंध की गुणवत्ता के लिए नवांश (D-9) निर्णायक होता है।
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विवाह में देरी के पीछे ज्योतिषीय स्तर पर सबसे बड़ा नियम है—सातवें सूचक (7th house/सप्तमेश/शुक्र-गुरु/UL) का संतुलित बल और सही समय। यदि सप्तम भाव/सप्तमेश बलहीन हैं, शनि-मंगल-राहु/केतु का दबाव अधिक है, या दशा-गोचर सहयोग नहीं कर रहे—तो देरी स्वाभाविक है। पर जब शुभ दृष्टियाँ मिलें, नवांश/UL में आधार मज़बूत हो, और समय (दशा-गोचर) साथ दे—तो देरी के बाद भी विवाह स्थिर, परिपक्व और संतुलित बनता है।
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