दूसरा विवाह योग — नवांश से कैसे समझें?

दूसरा विवाह योग

जीवन हमेशा एक ही राह पर नहीं चलता। कभी रिश्ते हमारी उम्मीदों जैसा साथ दे जाते हैं, और कभी परिस्थितियाँ, गलतफ़हमियाँ या समय की परीक्षा इंसान को भीतर तक तोड़ देती है। जब एक विवाह टूटता है, तो उसके साथ सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं टूटता, बल्कि एक सपना, एक भरोसा और दिल का एक हिस्सा भी बिखर जाता है।

लेकिन जीवन यहीं खत्म नहीं होता। कई बार ईश्वर हमें उसी रास्ते पर दोबारा खड़ा करता है जहाँ एक नया अध्याय शुरू हो सकता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब कुंडली में ग्रहों की स्थिति अनुकूल होती है, तब दूसरा विवाह योग का निर्माण होता है। इसका सबसे सटीक संकेत नवांश (D9) कुंडली देती है, जो मुख्य रूप से हमारे वैवाहिक जीवन की गहराई को दर्शाती है। आइए दूसरा विवाह योग को सरल, भावनात्मक और आध्यात्मिक दृष्टि से समझते हैं।

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1. कौन-से भाव दूसरे विवाह का संकेत देते हैं?

दूसरा विवाह योग

तिषीय गणना के अनुसार, पहले विवाह को कुंडली का सप्तम भाव दर्शाता है। लेकिन जब यह भाव कमजोर हो या पाप ग्रहों के दबाव में हो, तो अक्सर पहला रिश्ता टिकना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के मन में यह सवाल उठता है कि क्या उसकी कुंडली में दूसरा विवाह योग मौजूद है?

नवांश और लग्न कुंडली में दूसरा विवाह योग को समझने के लिए दो भाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते हैं:

  • नवम भाव (9th House): इसे भाग्य का पुनर्जन्म कहा गया है। जब यह भाव सक्रिय होता है, तो जीवन में फिर से नई उम्मीदें और नए रिश्तों का आगमन होता है।

  • ग्यारहवाँ भाव (11th House): यह इच्छाओं की पूर्ति का प्रतीक है। जब यह भाव मजबूत होता है, तो व्यक्ति के मन में फिर से रिश्ते की इच्छा जागृत होती है और उसे सफलता मिलती है।

यही कारण है कि दूसरा विवाह योग की पुष्टि करने के लिए 7वें, 9वें और 11वें भाव की स्थिति, उनके स्वामियों का संबंध और वर्तमान महादशा का गहन विश्लेषण बहुत महत्वपूर्ण होता है।

1. कौन-से भाव दूसरे विवाह का संकेत देते हैं?

दूसरा विवाह योग

2. D1 और D9 दोनों क्यों देखने आवश्यक हैं?

दो ओवरलैप होती कुंडलियाँ—D1 और D9—जो विवाह विश्लेषण का अंतर दर्शाती हैं।

ज्योतिषीय विश्लेषण में D1 (लग्न कुंडली) वह आधार है जहाँ वास्तविक घटनाएँ दिखाई देती हैं—जैसे पहला विवाह क्यों टूटेगा, कब टूटेगा और किस वजह से तनाव पैदा होगा। लेकिन जब हम दूसरा विवाह योग की बात करते हैं, तो नवांश (D9) कुंडली की भूमिका सबसे प्रमुख हो जाती है।

D9 यह बताता है कि दूसरा विवाह योग किस उद्देश्य से आपके जीवन में आएगा। यह हमें स्पष्ट करता है कि:

  • क्या यह रिश्ता स्थिर रहेगा?

  • क्या यह व्यक्ति के मन को शांति देगा या फिर वही पुराना संघर्ष दोबारा दोहराएगा?

नियम यह है कि अगर D1 में सप्तम भाव कमजोर हो लेकिन D9 (नवांश) में मजबूत हो, तो दूसरा विवाह योग जीवन में नई स्थिरता और खुशहाली लाता है। इसके विपरीत, यदि दोनों ही कुंडलियों में दोष हों, तो दूसरा विवाह भी आसानी से नहीं टिकता। इसलिए, दूसरा विवाह योग का पूर्ण फल जानने के लिए D1 और D9 का तुलनात्मक अध्ययन अनिवार्य है।

3. सप्तम भाव और उसके स्वामी की भूमिका

सप्तम भाव और उसके स्वामी को हाइलाइट करती ज्योतिषीय डिजाइन।

हस्तरेखा और कुंडली के विश्लेषण में सप्तम भाव को पहले विवाह का कारक माना जाता है। लेकिन यदि इस भाव का स्वामी राहु, शनि या मंगल जैसे क्रूर ग्रहों के प्रभाव में हो, या कुंडली के 6, 8, या 12वें भाव में चला जाए, तो पहले विवाह में संघर्ष और अलगाव की संभावना बढ़ जाती है।

यही वह समय होता है जब कुंडली में दूसरा विवाह योग सक्रिय होने की स्थिति बनती है। ज्योतिषीय सूत्रों के अनुसार:

  • दशा का महत्व: जब सप्तमेश की दशा समाप्त होती है और नवमेश (9th Lord) या एकादशेश (11th Lord) की दशा शुरू होती है, तभी दूसरा विवाह योग का वास्तविक रास्ता बनता है।

  • ग्रहों की स्थिति: कई बार सप्तमेश वक्री हो या दो राशियों में फल दे रहा हो, तब भी व्यक्ति के जीवन में दो बार विवाह-संबंध होने की प्रबल संभावना रहती है।

ज्योतिष का यह ज्ञान न केवल भविष्य बताता है बल्कि हमें जीवन के कठिन समय के लिए तैयार भी करता है।

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3. सप्तम भाव और उसके स्वामी की भूमिका

सप्तम भाव और उसके स्वामी को हाइलाइट करती ज्योतिषीय डिजाइन।

4. नवांश से दूसरा विवाह कैसे पता चलता है?

एक पुरुष दूसरी दुल्हन को माला पहनाता हुआ, पीछे उदास पहली पत्नी खड़ी हुई।

ज्योतिष शास्त्र में लग्न कुंडली केवल बाहरी स्थिति बताती है, लेकिन नवांश (D9 Chart) ही वह दर्पण है जो असली विवाह-सुख दिखाता है। नवांश कुंडली में कुछ विशेष संकेत स्पष्ट रूप से दूसरा विवाह योग की ओर इशारा करते हैं:

  • भावों का संबंध: यदि D9 कुंडली में सप्तम भाव का स्वामी (7th Lord) 9वें या 11वें भाव के स्वामी से युति या दृष्टि संबंध बना ले, तो दूसरा विवाह योग अत्यंत मजबूत हो जाता है।

  • पाप ग्रहों का प्रभाव: यदि राहु या मंगल नवांश कुंडली के सप्तम भाव से जुड़े हों, तो यह अक्सर पहले विवाह के टूटने की संभावना को बढ़ा देते हैं।

  • शुभ ग्रहों की दृष्टि: यदि अलगाव के बाद वही सप्तम भाव गुरु (Jupiter) या शुक्र (Venus) से दृष्ट हो जाए, तो दूसरा विवाह योग जीवन में स्थिरता, सुख और मानसिक शांति लेकर आता है।

  • आपसी सामंजस्य: D9 में लग्नेश और सप्तमेश के बीच का तालमेल यह स्पष्ट करता है कि दूसरा विवाह प्रेम से होगा या किसी पारिवारिक दबाव में।

5. ग्रहों के विशेष संकेत

राहु, शुक्र, गुरु, शनि जैसे ग्रहों के प्रतीक दर्शाती छवि।

ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशिष्ट ग्रह संयोजन सीधे तौर पर दूसरा विवाह योग का निर्माण करते हैं। जब नवांश और लग्न कुंडली में इन ग्रहों का प्रभाव बढ़ता है, तो जीवन में पुनर्विवाह की संभावनाएँ प्रबल हो जाती हैं:

  • राहु का सप्तम भाव से संबंध: राहु का सप्तम भाव पर प्रभाव व्यक्ति को पुराने रिश्तों से बाहर निकालकर नए रिश्तों की ओर ले जाता है और जीवन में बदलाव की तीव्र इच्छा पैदा करता है।

  • वक्री शुक्र या द्विराशि शुक्र: शुक्र प्रेम का कारक है। जब यह वक्री हो या दो राशियों (द्विराशि) में फल दे रहा हो, तो ऐसे लोगों को अक्सर जीवन में दो बार प्रेम या विवाह का अनुभव मिलता है, जो दूसरा विवाह योग का एक स्पष्ट संकेत है।

  • गुरु का 9वें या 11वें भाव से संबंध: बृहस्पति (गुरु) की कृपा जब भाग्य (9वें) या लाभ (11वें) भाव पर पड़ती है, तो यह वैवाहिक भाग्य को पुनः सक्रिय करता है और एक सफल दूसरा विवाह संभव बनाता है।

  • शनि की दृष्टि और स्थिरता: शनि देव हर कार्य में देरी अवश्य करते हैं, लेकिन सही समय आने पर स्थिरता भी देते हैं। यदि दूसरा विवाह योग शनि की शुभ दशा में फलीभूत हो, तो वह रिश्ता अधिक टिकाऊ और गंभीर माना जाता है।

5. ग्रहों के विशेष संकेत

राहु, शुक्र, गुरु, शनि जैसे ग्रहों के प्रतीक दर्शाती छवि।

6. पहला विवाह क्यों टूटता है?

टूटी हुई अंगूठी और दरार वाला दिल दर्शाती भावनात्मक छवि।

अक्सर यह माना जाता है कि केवल पाप ग्रह ही विवाह तोड़ते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक गहरी है। कई बार दशा और गोचर की संयुक्त स्थिति भी रिश्ते को खत्म करने का कारण बन जाती है।

यदि कुंडली में सप्तमेश की दशा चल रही हो और उसमें राहु, मंगल या केतु जैसे ग्रहों की अंतर्दशा आ जाए, और उसी समय गोचर का शनि सप्तम भाव से गुजर रहा हो, तो अलगाव की स्थिति बन जाती है। ऐसे कठिन समय के बाद ही कुंडली में दूसरा विवाह योग की संभावनाएं तलाशना शुरू किया जाता है।

रिश्ते टूटने का एक बड़ा कारण प्रेम और जिम्मेदारी के बीच का असंतुलन भी है:

  • भावों का तालमेल: कई बार पाँचवें (प्रेम) और सप्तम (विवाह) भाव के बीच सही तालमेल नहीं बन पाता।

  • इच्छा बनाम जिम्मेदारी: व्यक्ति में प्रेम की इच्छा तो प्रबल होती है, लेकिन विवाह की जिम्मेदारियां नहीं निभाई जातीं। यही वैचारिक अंतर रिश्ते को जड़ से कमजोर कर देता है।

जब व्यक्ति इन अनुभवों से सीखकर आगे बढ़ता है, तब दूसरा विवाह योग उसे जीवन में एक नया और अधिक परिपक्व अवसर प्रदान करता है।

7. दूसरा विवाह कब बनता है?

एक पुरुष दूसरी पत्नी को माला पहनाते हुए और पीछे पहली पत्नी उदास स्थिति में।

ज्योतिषीय गणना में समय का विशेष महत्व है। दूसरा विवाह योग तब फलीभूत होता है जब कुंडली में नवमेश (9th Lord), एकादशेश (11th Lord) या शुक्र (Venus) की दशा सक्रिय हो जाए। ये ग्रह जीवन में सुख और नए रिश्तों के द्वार खोलते हैं।

ग्रहों के गोचर की भूमिका भी इसमें बहुत अहम होती है:

  • गुरु का प्रभाव: देवगुरु बृहस्पति का गोचर यदि जन्म कुंडली के 7वें या 9वें भाव पर दृष्टि डाल रहा हो, तो दूसरा विवाह योग और भी जल्दी और शुभता के साथ बनता है।

  • नवांश की पुष्टि: यदि गोचर के समय ही नवांश (D9) कुंडली में शुभ ग्रह सप्तम भाव को देख रहे हों, तो दूसरा विवाह योग जीवन को एक नई, सकारात्मक और खुशहाल दिशा देता है।

7. दूसरा विवाह कब बनता है?

एक पुरुष दूसरी पत्नी को माला पहनाते हुए और पीछे पहली पत्नी उदास स्थिति में।

8. क्या दूसरा विवाह स्थिर रहता है?

नवविवाहित जोड़ा शांत भाव में एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए।

तिषीय दृष्टिकोण से दूसरा विवाह योग तभी पूर्ण सुख प्रदान करता है, जब नवांश (D9) कुंडली में शुक्र, गुरु और चंद्रमा जैसे शुभ ग्रह मज़बूत और अच्छी स्थिति में हों। ऐसे ग्रहों का शुभ प्रभाव यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्ति अपने जीवन के उत्तरार्ध या बाद के हिस्से में एक सही और सहायक जीवनसाथी प्राप्त करे।

हालांकि, नवांश का सूक्ष्म विश्लेषण करते समय सावधानी भी ज़रूरी है:

  • कर्मों का चक्र: यदि नवांश कुंडली में वही पुराने ग्रह दोष दोबारा दिखाई देते हैं, तो व्यक्ति का ‘Karmic Pattern’ फिर से सामने आ सकता है, जिससे रिश्ते में वही पुरानी चुनौतियाँ पैदा हो सकती हैं।

  • गहन विश्लेषण की आवश्यकता: यही कारण है कि दूसरा विवाह योग होने पर भी, किसी भी अंतिम निर्णय या पुनर्विवाह से पहले नवांश कुंडली का बारीकी से विश्लेषण करना बहुत आवश्यक है।

सही ज्योतिषीय मार्गदर्शन आपको पुराने संघर्षों से मुक्त कर एक सुखद भविष्य की ओर ले जा सकता है।

निष्कर्ष

एक महिला की परछाई और दूर खड़ा खुशहाल नया दंपत्ति।
एक महिला की परछाई और दूर खड़ा खुशहाल नया दंपत्ति।

अक्सर समाज में पुनर्विवाह को लेकर संकोच देखा जाता है, लेकिन सच तो यह है कि दूसरा विवाह योग कोई दुर्भाग्य नहीं, बल्कि आत्मा का एक नया और सुंदर अध्याय होता है। पहला विवाह हमें जो अनुभव और सीख नहीं दे पाता, वही परिपक्वता जीवन हमें दूसरे विवाह के माध्यम से सिखाता है।

ज्योतिषीय दृष्टि से देखें तो:

  • D1 कुंडली का संकेत: आपकी लग्न कुंडली (D1) यह दिखाती है कि पिछला रिश्ता क्यों टूटा और किन ग्रहों ने अलगाव की स्थिति बनाई।

  • D9 कुंडली का उद्देश्य: इसके विपरीत, नवांश कुंडली (D9) यह दर्शाती है कि दूसरा विवाह योग किस उद्देश्य से आपके जीवन में प्रवेश कर रहा है।

यदि नवांश में शुभ ग्रह मजबूत स्थिति में हों और सही ग्रहों की दशा सहयोग करे, तो दूसरा विवाह योग जीवन में शांति, संतुलन और एक गहरी परिपक्वता लेकर आता है। यह केवल दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि जीवन को नए सिरे से संवारने का एक ईश्वरीय अवसर है।

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