जीवन हमेशा एक ही राह पर नहीं चलता। कभी रिश्ते हमारी उम्मीदों जैसा साथ दे जाते हैं, और कभी परिस्थितियाँ, गलतफ़हमियाँ या समय की परीक्षा इंसान को भीतर तक तोड़ देती है। जब एक विवाह टूटता है, तो उसके साथ सिर्फ़ एक रिश्ता नहीं टूटता, बल्कि एक सपना, एक भरोसा और दिल का एक हिस्सा भी बिखर जाता है।
लेकिन जीवन यहीं खत्म नहीं होता। कई बार ईश्वर हमें उसी रास्ते पर दोबारा खड़ा करता है जहाँ एक नया अध्याय शुरू हो सकता है। ज्योतिष में इसे दूसरा विवाह योग कहा गया है, और इसका सबसे सटीक संकेत नवांश (D9) कुंडली देती है। आइए इसे सरल, भावनात्मक और आध्यात्मिक दृष्टि से समझते हैं।
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पहले विवाह को सप्तम भाव दर्शाता है। लेकिन जब यह भाव कमजोर हो या पाप ग्रहों के दबाव में हो, तो पहला रिश्ता टिकना मुश्किल हो जाता है।
दूसरे विवाह के लिए दो भाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते हैं।
नवम भाव
इसे भाग्य का पुनर्जन्म कहा गया है। जब यह सक्रिय होता है, तो जीवन फिर से उम्मीद देता है।
ग्यारहवाँ भाव
यह इच्छाओं की पूर्ति का प्रतीक है। जब यह भाव मजबूत होता है, तो व्यक्ति फिर से रिश्ते की इच्छा करता है।
इसलिए दूसरे विवाह को समझने के लिए 7वें, 9वें और 11वें भाव की स्थिति और दशा बहुत महत्त्वपूर्ण होती है।
D1 वह कुंडली है जहाँ वास्तविक घटना दिखती है — पहला विवाह क्यों टूटेगा, कब टूटेगा, किस वजह से टूटेगा।
लेकिन D9 यह बताता है कि दूसरा विवाह किस उद्देश्य से जीवन में आएगा।
क्या यह रिश्ता स्थिर रहेगा, क्या यह व्यक्ति के मन को शांति देगा या फिर वही संघर्ष दोबारा दोहराएगा।
अगर D1 में सप्तम भाव कमजोर हो लेकिन D9 में मजबूत हो, तो दूसरा विवाह जीवन में स्थिरता लाता है।
यदि दोनों जगह दोष हों, तो दूसरा विवाह भी आसानी से नहीं टिकता।
सप्तम भाव पहला विवाह है।
इसका स्वामी यदि राहु, शनि या मंगल के प्रभाव में हो, या 6, 8, 12 भाव में चला जाए, तो पहले विवाह में संघर्ष बढ़ते हैं।
जब सप्तमेश की दशा समाप्त होती है और नवमेश या एकादशेश की दशा शुरू होती है, तभी दूसरे विवाह का रास्ता बनता है।
कई बार सप्तमेश वक्री हो या दो राशियों में फल दे रहा हो, तब भी व्यक्ति को जीवन में दो बार विवाह-संबंध हो सकते हैं।
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नवांश असली विवाह-सुख दिखाता है।
इसमें कुछ संकेत दूसरे विवाह की ओर इशारा करते हैं।
यदि D9 में सप्तम भाव का स्वामी 9वें या 11वें भाव से जुड़ जाए, तो दूसरे विवाह का योग मजबूत बनता है।
यदि राहु या मंगल नवांश में सप्तम भाव से जुड़े हों, तो पहला विवाह टूटने की संभावना बढ़ती है।
यदि टूटने के बाद वही सप्तम भाव गुरु या शुक्र से दृष्ट हो जाए, तो दूसरा विवाह स्थिरता और शांति लाता है।
D9 में लग्नेश और सप्तमेश का सामंजस्य यह बताता है कि दूसरा विवाह प्रेम से होगा या दबाव में।
कुछ ग्रह संयोजन सीधे तौर पर दूसरे विवाह का योग देते हैं।
राहु का सप्तम भाव से संबंध
यह व्यक्ति को नए रिश्तों की ओर ले जाता है और एक बदलाव की इच्छा पैदा करता है।
वक्री शुक्र या द्विराशि शुक्र
ऐसे लोगों को दो बार प्रेम या विवाह का अनुभव मिलता है।
गुरु का 9वें या 11वें भाव से संबंध
यह भाग्य को पुनः सक्रिय करता है और दूसरा विवाह संभव बनाता है।
शनि की दृष्टि
शनि देरी करता है, लेकिन सही समय पर स्थिरता देता है।
दूसरा विवाह यदि शनि की शुभ दशा में हो, तो अधिक टिकाऊ माना जाता है।
पहला विवाह सिर्फ़ पाप ग्रहों से नहीं टूटता।
कई बार दशा-गोचर की संयुक्त स्थिति रिश्ता तोड़ देती है।
यदि सप्तमेश की दशा में राहु, मंगल या केतु की अंतर्दशा आ जाए और उसी समय गोचर शनि सप्तम भाव से गुजर रहा हो, तो अलगाव संभव हो जाता है।
कई बार पाँचवें (प्रेम) और सप्तम (विवाह) भाव के बीच तालमेल नहीं बनता।
प्रेम की इच्छा तो होती है, लेकिन जिम्मेदारी नहीं निभाई जाती।
यही अंतर रिश्ते को कमजोर कर देता है।
दूसरा विवाह तब बनता है जब नवमेश, एकादशेश या शुक्र की दशा सक्रिय हो जाए।
गुरु का गोचर यदि 7वें या 9वें भाव पर दृष्टि डाल रहा हो, तो दूसरा विवाह और भी जल्दी बनता है।
यदि उसी समय D9 में शुभ ग्रह सप्तम भाव को देख रहे हों, तो दूसरा विवाह जीवन को नई दिशा देता है।
हाँ, तब जब नवांश में शुक्र, गुरु और चंद्रमा अच्छी स्थिति में हों।
ऐसे लोग जीवन के बाद के हिस्से में सही साथी पाते हैं।
यदि वही दोष फिर से दोहरते हैं, तो karmic pattern दोबारा सामने आता है।
इसलिए नवांश का विश्लेषण दोबारा विवाह से पहले बहुत आवश्यक है।
दूसरा विवाह दुर्भाग्य नहीं, बल्कि आत्मा का नया अध्याय होता है।
पहला विवाह हमें जो नहीं सिखा पाता, वही सीख जीवन दूसरे विवाह के माध्यम से देता है।
D1 दिखाता है कि रिश्ता क्यों टूटा,
और D9 दिखाता है कि दूसरा रिश्ता किस उद्देश्य से जीवन में प्रवेश कर रहा है।
अगर नवांश में शुभ ग्रह मजबूत हों और दशा सहयोग करे, तो दूसरा विवाह जीवन में शांति, संतुलन और परिपक्वता लाता है।
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