विवाह मे देरी - कुंडली में 7 वास्तविक कारण

विवाह में देरी — कुंडली में 7 वास्तविक कारण

विवाह का “योग” हर व्यक्ति की कुंडली में अलग-अलग तरह से बनता है। कई बार जीवनसाथी मिलने मे देरी हो जाती है। बात अधूरी रह जाती है। या मन ही मन तैयारियाँ होते हुए भी तारीख तय नहीं हो पाती।

ज्योतिष के दृष्टिकोण से इसकी ठोस वजह कुंडली में दिखाई देती हैं—खासतौर पर सप्तम भाव, उसके स्वामी, दशा-अन्तर्दशा, और शुभ/पाप ग्रहों का प्रभाव। आइए, उन सात वास्तविक कारणों को सरल भाषा में समझें जिनसे विवाह में देरी दिखती है।

1) सप्तम भाव और सप्तमेश (स्वामी) की स्थिति/बल

विवाह का मूल संकेत सप्तम भाव (7th house) और उसका स्वामी देता है।

  • कमज़ोरी के संकेत: सप्तम भाव का शून्य बल, पापकर्तरी योग (दोनों ओर पाप ग्रहों की बंदी), या सप्तमेश का 6/8/12 में जाना, नीच होना, अस्त/तप्त (सूर्य से दग्ध) होना, अथवा बार-बार कठोर दृष्टियाँ (शनि/मंगल/राहु-केतु) पड़ना—ये सब देरी करवाते हैं।
  • व्यावहारिक रूप: रिश्ता आता है पर तय नहीं होता, या तय होकर टूट जाता है; परिवार/परिस्थितियाँ बार-बार बदलती हैं। और कुछ समझ नहीं आता है की अब क्या करें या क्या करना चाहिए।
  • क्या जाँचें: सप्तम भाव पर शुभ दृष्टि (गुरु/बुध/शुक्र) है या नहीं, और सप्तमेश की दशा-भुक्ति कब चल रही है। यदि सप्तमेश निर्बल है पर नवांश (D-9) में मज़बूत है तो देरी के बाद भी विवाह संभव और स्थिर हो सकता है।

2) शनि का धीमा-कारक प्रभाव

शनि स्वभाव से विलंबकारी (delay-giver) माना गया है। इसका मतलब हमेशा “नकारात्मक” नहीं—कई बार शनि देरी कराता है ताकि संबंध परिपक्व होकर टिकाऊ बने। शनि को अगर समझो तो तुम जो चाहोगे वो हासिल कर पाओगे, लेकिन शनि को समझना मुश्किल है।

  • कब देरी बढ़ती है: शनि का सप्तम भाव, सप्तमेश, शुक्र/उपपद (UL) पर कठोर प्रभाव; शनि की महादशा/अन्तर्दशा में 7वें कारकों पर तनाव; लग्न/नवांश में शनि की कड़ी स्थिति।
  • लक्षण: “ज़िम्मेदारी” या “कैरियर/परिवारिक दायित्व” पहले आते हैं, मन बार-बार कहता है “थोड़ा और इंतज़ार”, या उपयुक्त प्रस्ताव देर से दिखते हैं।
  • सकारात्मक पक्ष: शनि जब शुभ दृष्टियों के साथ संतुलित हो, तो देरी के बाद स्थिर और परिपक्व जीवनसाथी देता है। लेकिन ये आपके कर्मों पर निर्भर करता है।

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3) शुक्र-गुरु की दुर्बलता (विवाह कारक ग्रह)

विवाह/संबंधों की आकर्षण-शक्ति, सौम्यता और सहमति का बड़ा भाग शुक्र से, और समझ-दया-समर्पण का बड़ा भाग गुरु से समझा जाता है (आधुनिक दृष्टि में दोनों ही सभी जातकों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं)।

  • कमज़ोरी कैसे दिखती है: शुक्र/गुरु का नीच होना, अस्त होना, कठोर पाप दृष्टियाँ, 6/8/12 में फँसना, या नवांश में बलहीन होना।
  • परिणाम: पसंद-नापसंद में टकराव, प्रतिबद्धता से डर, रिश्तों में अनिश्चितता, या परिवारों का सहमति तक न पहुँच पाना।
  • क्या देखें: शुक्र-गुरु ग्रहों में कितना बल है, नवांश स्थितियाँ, और क्या इन पर गुरु/बुध की शुभ दृष्टि का संबंध मिल रहा है।

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राहू केतु होते है शादी मे रुकावट

4) राहु-केतु एवं 1-7 धुरी पर ग्रहणात्मक दबाव

राहु-केतु परिवर्तन और गलतफहमियों के कारक हैं; जब ये लग्न-सप्तम (1–7) धुरी को प्रभावित करते हैं, तो सम्बन्धों में धुंध, भ्रम, बाहरी अड़चनें, या अप्रत्याशित उलट-फेर आ सकते हैं।

  • कठिन संयोजन: राहु का सप्तम में होना और शुक्र/सप्तमेश पर कठोर दृष्टि; केतु का लग्न/नवांश लग्न पर होना—यह व्यक्तिगत अपेक्षाओं और सामाजिक वास्तविकताओं में गैप बनाता है।
  • परिणाम: अचानक रिश्तों का बनना-बिगड़ना, अविश्वसनीय संकेत, या “एकदम सही” व्यक्ति मिलने के बावजूद औपचारिकता में बाधा।
  • क्या देखें: क्या गुरु/शुभ ग्रह राहु-केतु को नियंत्रित/संतुलित कर रहे हैं? क्या गोचर (transit) में राहु-केतु UL (उपपद लग्न) या 7वें कारकों से हट रहे हैं?

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5) मंगल दोष/कठोर पाप प्रभाव

विवाह मे देरी का कर्म मंगल दोष होता है

मंगल ऊर्जा और दृढ़ता देता है, पर संबंध-भावों पर अत्यधिक कठोर पड़ने से टकराव/जल्दबाजी/रूखापन ला सकता है।

  • कब समस्या बढ़ती है: मंगल का सप्तम में होना और उस पर शनि/राहु की संगत या दृष्टि; 7वें कारकों की शनि+मंगल बंदी; अथवा नवांश में 7वें पद पर पाप-समूह।
  • देरी क्यों: परिवारों में असहमति, ग़लत समय पर ग़लत संवाद, या छोटी बात का बड़ा विवाद बन जाना।
  • संतुलन कैसे होता है: गुरु/बुध/शुक्र की शुभ दृष्टि, या दशा में शुभ ग्रहों का क्रम—ये सब मंगल की तीक्ष्णता को संतुलित कर देते हैं, तब देरी के बाद विवाह स्थिर रहता है।
दशा-अन्तर्दशा/गोचर का “टाइमर” बंता है कारण शादी विवाह मे देरी का |

6) दशा-अन्तर्दशा/गोचर का “टाइमर”

कई बार कुंडली मज़बूत होती है, पर समय साथ नहीं देता। विवाह के संकेत तभी साकार होते हैं जब संबंधित दशा-अन्तर्दशा सक्रिय हो और गोचर समर्थन करें।

  • क्या देखें:
    • सप्तमेश, शुक्र, गुरु, UL का स्वामी, या 2/7 के स्वामियों की दशा-भुक्ति।
    • गोचर में गुरु का 7वें कारकों पर शुभ पहलू (दृष्टि/संयोजन); शनि का अत्यधिक दमन न करना; राहु-केतु का 1–7 धुरी से हटना।
  • देरी का व्यावहारिक अर्थ: सही लोग मिलते हैं पर प्रतिबद्धता उस विंडो में पक्की होती है जब दशा-गोचर साथ खड़े होते हैं। इससे पहले बार-बार लगभग तक बात जाकर रुक सकती है।

7) उपपद लग्न (UL) और नवांश (D-9) में असंतुलन

विवाह की स्थिरता/समाज-सम्मुख रूप के लिए उपपद लग्न (UL) महत्त्वपूर्ण संकेतक है, वहीं संबंध की गुणवत्ता के लिए नवांश (D-9) निर्णायक होता है।

  • UL के संकेत: UL पर पाप ग्रहों की कठोर पकड़, या 2/7 से UL को बार-बार शनि/मंगल/राहु की चोट—तो “समाज में बात पक्की” होने में देर लगती है।
  • नवांश के संकेत: D-9 में सप्तम पद/शुक्र-गुरु/सप्तमेश बलहीन हों, या पाप दृष्टियों से घिरे हों—तो रिश्ता टिकाऊ रूप में crystallize होने में समय लगता है।
  • सकारात्मक अपवाद: यदि जन्मकुंडली में देरी दिखे पर D-9/UL संतुलित हों, तो देरी के बाद गहरा और टिकाऊ विवाह संभावित होता है।

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कुछ महत्वपूर्ण स्पष्टताएँ (ताकि निष्कर्ष 100% सही रहें)

  • एक योग = एक परिणाम नहीं: किसी एक संकेत से “निश्चित” देरी कहना सही नहीं होगा। सामूहिक मूल्यांकन करना ज़रूरी है—भाव, स्वामी, कारक ग्रह, दशा और गोचर सभी मिलकर तस्वीर साफ़ करते हैं।
  • देरी = नकारात्मक नहीं: शनि/दृष्टियों के कारण आई देरी अक्सर परिपक्व, जिम्मेदार और स्थिर रिश्ते का आधार बन सकती है।
  •  व्यक्तिगत संदर्भ ज़रूरी: परिवार, कैरियर, स्थान, स्वास्थ्य, और व्यक्तिगत प्राथमिकताएँ—ये सब भी ज्योतिषीय योगों के साथ मिलकर वास्तविक परिणाम तय करते हैं।

विवाह में देरी के पीछे ज्योतिषीय स्तर पर सबसे बड़ा नियम है—सातवें सूचक (7th house/सप्तमेश/शुक्र-गुरु/UL) का संतुलित बल और सही समय। यदि सप्तम भाव/सप्तमेश बलहीन हैं, शनि-मंगल-राहु/केतु का दबाव अधिक है, या दशा-गोचर सहयोग नहीं कर रहे—तो देरी स्वाभाविक है। पर जब शुभ दृष्टियाँ मिलें, नवांश/UL में आधार मज़बूत हो, और समय (दशा-गोचर) साथ दे—तो देरी के बाद भी विवाह स्थिर, परिपक्व और संतुलित बनता है।

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