Rajat Kumar

“ऑफिस तनाव, बॉस का दबाव और ग्रहों के असर से बदलता काम का माहौल—ज्योतिषीय प्रभाव दर्शाती छवि।”

Office में दिक्कतें क्यों बढ़ रही हैं? ज्योतिषीय कारण

ऑफिस में अचानक काम रुकने लगे, लोग बदलने लगें या बात-बात पर तनाव होने लगे—तो ये सिर्फ परिस्थितियाँ नहीं, ग्रहों का असर भी हो सकता है। शनि, मंगल, राहु और सूर्य जैसे ग्रह आपके करियर, व्यवहार और ऑफिस माहौल को सीधे प्रभावित करते हैं। इस ब्लॉग में जानिए कि कौन सा ग्रह कैसी दिक्कतें देता है और उन्हें कैसे संभाला जा सकता है।

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“ग्रहों की चेतावनी और किस्मत रुकने के ज्योतिषीय संकेत को दर्शाती आध्यात्मिक डार्क थीम इमेज, जिसमें इंसान, ग्रह और चेतावनी संकेत दिखाई दे रहे हैं।”

किस्मत रुकने के ज्योतिषीय संकेत

जब जिंदगी अचानक रुकने लगे, फैसले गलत होने लगें और हालात बिगड़ने लगें—ये किसी बड़े ग्रह संकेत की चेतावनी हो सकती है। जानें कौन-से ज्योतिषीय संकेत बताते हैं कि किस्मत धीमी हो रही है और इस समय क्या करना चाहिए।

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एक व्यक्ति की परछाई और सामने नवांश से दिखने वाला दूसरा विवाह संकेत, आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के साथ।

दूसरा विवाह योग — नवांश से कैसे समझें?

दूसरा विवाह योग नवांश से कैसे समझें? जीवन हर मोड़ पर हमें सीख देता है। पहला रिश्ता टूट जाए तो नवांश कुंडली बताती है कि दूसरा विवाह कब, कैसे और किस उद्देश्य से जीवन में आता है।

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राहू और शुक्र का कार्मिक प्रभाव की वजह से जीवन मे रिश्तों के उतार चदाव आते है

राहु–शुक्र योग: कर्मिक प्रेम, मोह, माया और आत्मिक जागृति

राहु–शुक्र योग ऐसा प्रेम लाता है जो अचानक जीवन में प्रवेश करता है, हमें भीतर तक बदल देता है और कई बार पुराने जन्मों के अधूरे अध्यायों को भी सामने ले आता है। इस ब्लॉग में जानिए कैसे यह योग आकर्षण, मोह, माया और कर्मिक रिश्तों के रहस्यों को उजागर करता है — और किस तरह यह प्रेम कभी दिल तोड़ता है, तो कभी आत्मा को जागृति की ओर भी ले जाता है।

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विवाह मे देरी - कुंडली में 7 वास्तविक कारण

विवाह में देरी — कुंडली में 7 वास्तविक कारण

विवाह में देरी के पीछे कौन-कौन से ज्योतिषीय कारण जिम्मेदार होते हैं? इस ब्लॉग में सप्तम भाव, शनि, मंगल दोष और राहु-केतु के प्रभाव को सरल भाषा में समझाया गया है।

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संतान रेखा क्या है? आपकी हथेली मे छिपा है रहस्य

संतान रेखा क्या है?

संतान रेखा क्या है? आपकी हथेली मे छिपा है रहस्य बचपन मे सभी ने कभी न कभी यह अनुभव किया ही होगा, हमरे घर की दादी या नानी कई बार हाथ देखकर हमारी शादियों, पढ़ाई या बच्चों तक के बारे में बातें बता देती थीं। और सभी लोग इसको जानने के लिए उत्सुक रहते हैं | हस्तरेखा को देखकर यह सब जानकारी देना कोई आज की खोज नहीं है बल्कि यह सदियों पुराना ज्ञान है, जिसमे इंसान क ए स्वभाव और भविष्य की जानकारी उसके हाथों मे छुपी रहती है | अगर आप भी Palmistry Reading सीखना चाहते हो तो आप The Astrology Academy of India – +91-8920510069 संपर्क कर सकते है | संतान रेखा कहाँ होती है? अगर आप भी जानना चाहते है की संतान रेखा कहाँ  होती है तो, आप अपनी हथेली को ध्यान से देखिए। कनिष्ठा (सबसे छोटी उंगली) के ठीक नीचे, जहाँ विवाह रेखाएँ निकलती हैं, वहीं कुछ छोटी-छोटी रेखाएँ होती हैं। इन रेखयों को ही संतान रेखाएँ कहा जाता है। ये रेखाएँ कभी बहुत पतली और छोटी दिखती हैं, तो कभी गहरी और साफ। कहा जाता है कि दायाँ हाथ भविष्य के संकेत देता है और बाँया हाथ हमारी क्षमता व संभावनाओं को दिखाता है। इसीलिए हस्त रेखा ज्ञान में दोनों हाथों को देखना ज़्यादा सही माना जाता है। कौन सी रेखाएँ क्या बताती हैं? गहरी और साफ रेखा → यह आमतौर पर स्वस्थ और मज़बूत संतान का संकेत देती है। हल्की या टूटी हुई रेखा → यह स्वास्थ्य की चुनौतियों या गर्भपात की संभावना का संकेत हो सकता है। धुंधली रेखा → बच्चे के पालन-पोषण या स्वास्थ्य में कठिनाई की ओर इशारा करती है। पर याद रखिए, यह सिर्फ संकेत हैं, अंतिम सच नहीं। मेरे अनुभव में मैंने देखा है कि जिनकी रेखाएँ गहरी और स्पष्ट होती हैं, उनकी संताने अक्सर ऊर्जा और जीवंतता से भरी होती हैं। अगर आप इस बारे में और अधिक जांनकारी चाहते है तो आप Astrologer Rajat Kumar से संपर्क कर सकते है | हथेली के और भी संकेत सिर्फ संतान रेखाएँ ही नहीं, हथेली के अन्य हिस्से भी बच्चे के बारे में जानकारी देते हैं: शुक्र पर्वत (अंगूठे के नीचे का भाग): अगर यह हिस्सा उभरा और भरा हुआ हो तो यह अच्छी प्रजनन क्षमता का संकेत है। अन्य पर्वत: हथेली के अलग-अलग पर्वत भी संतान से जुड़े संकेत दे सकते हैं। अक्सर की जाने वाली गलतियाँ लोग हर छोटी-सी रेखा को संतान रेखा मान लेते हैं। असल में, सिर्फ साफ और स्पष्ट रेखाओं पर ध्यान देना चाहिए। सिर्फ एक हाथ देखकर निष्कर्ष निकालना भी सही नहीं है। दोनों हाथों का विश्लेषण करना ज़रूरी है। सिर्फ एक हाथ देखना – जबकि नियम है: दायाँ हाथ (present & future) + बाँया हाथ (past & potential) दोनों देखना चाहिए। उम्र का ध्यान न रखना, हथेली की रेखाए जीवन भर बदलती रहती है | 20 साल की और 40 साल की रेखाओं मे फरक हो सकता है | खुद की हथेली देखकर दर जाना, या फिर पूर्ण जानकारी न होने पर थोड़ा भोट जानकर लोगों को भी दर देना | धार्मिक या अंधविश्वासी दृष्टि से रेखा को देखना, कई लोग हथेली की हर रेखा को भाग्य का अंतिम सच मान लेते हैं। जबकि हस्तरेखा सिर्फ संकेत देती है, अंतिम निर्णय आपके कर्म और परिस्थितियाँ करती हैं। 👉 याद रखिए:हस्तरेखा मार्गदर्शन देती है, भविष्य नहीं लिखती।आपके कर्म और सोच ही आपकी किस्मत बनाते हैं। अगर आप इस बारे में और अधिक जांनकारी चाहते है तो आप Astrologer Rajat Kumar से संपर्क कर सकते है | अगर रेखाएँ कम हों या न हों तो?   अक्सर लोग परेशान हो जाते हैं, जब अपनी हथेली में संतान रेखाएँ उनको कम दिखाई देती हैं | या बिल्कुल नज़र नहीं आतीं। कई लोग तो घबरा कर यह भी सोच लेते हैं कि, शायद उनके जीवन में संतान का सुख लिखा ही नहीं होगा | लेकिन ऐसा मानना सबसे बड़ी गलती है। हस्तरेखा शास्त्र हमें केवल एक संकेत देता है, यह कोई अंतिम सत्य नहीं है।   ऐसा कई बार होता है की, कई लोगों की हाथों की रेखा धुंधली होती है या स्पष्ट दिखाई नहीं देती है | ऐसे मे हर नहीं माननी चाहिए आपको हिम्मत से काम लेना चाहिए | और अपने कर्म अच्छे रखने चाहिए | अगर हमारे कर्म अच्छे होंगे तो जो नसीब मे लिखा नहीं है वो भी मिल जाएगा | निष्कर्ष हस्तरेखा शास्त्र हमें जीवन का नक्शा नहीं, बल्कि एक दिशा दिखाता है। यह हमारे हाथों में बनी रेखाओं के माध्यम से सिर्फ संकेत देता है कि किस क्षेत्र में अवसर मिल सकते हैं और कहाँ सावधान रहने की ज़रूरत है। लेकिन याद रखिए, ये रेखाएँ सिर्फ एक आईना हैं – बाकी सब हमारे कर्म तय करते है की हमारे साथ क्या होगा | बहुत से लोग सोचते हैं कि हथेली में जो लिखा है वही अंतिम भाग्य है। लेकिन सच तो यह है कि रेखाएँ बदलती रहती हैं, ठीक वैसे ही जैसे हमारे विचार और कर्म बदलते रहते हैं। अगर इंसान अपनी सोच को सकारात्मक रखे और कठिनाइयों के बीच भी मेहनत करता रहे, तो कई बार किस्मत भी उसका साथ देने लगती है। आख़िरकार, हस्तरेखा शास्त्र का असली उद्देश्य हमें डराना नहीं बल्कि जागरूक करना है। यह हमें बताता है कि संभावनाएँ क्या हैं और हमें किन क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए। बाक़ी सब आपकी मेहनत, आपकी सोच और आपके कर्म पर निर्भर है। इसलिए अपनी हथेली की लकीरों को देखकर उत्सुक रहिए, सीखिए, पर कभी चिंता मत कीजिए। क्योंकि असली शक्ति आपकी मेहनत, कर्म और आपके सकारात्मक दृष्टिकोण में छिपी है।

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चातुर्मास क्या होता है

चातुर्मास 2025: चातुर्मास की महिमा

चातुर्मास 2025: चातुर्मास की महिमा चातुर्मास क्या होता है? चातुर्मास का अर्थ है — चार महीनों का विशेष आध्यात्मिक काल । यह हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) तक चलता है। ऐसा कहा जाता है की इस अवधि मे भगवान विष्णु योगनिद्रा मे चले जाते है | और चातुर्मास मे कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है जैसे विवाह, ग्रहप्रवेश, या किसी नए कार्य की शुरुआत | चातुर्मास मे 4 अलग-अलग महीनों के अलग-अलग त्याग आते है पहला महिना 6 जुलाई 2025 से 8 अगस्त 2025 – हरी पत्तेदार सब्जियों का त्याग | दूसरा महिना 9 अगस्त 2025 से 6 सितंबर 2025 – दही का त्याग | तीसरा महिना 7 सितंबर 2025 से 6 अक्टूबर 2025 – दूध और उससे बनी चीजों का त्याग | चौथा माहीना 7 अक्टूबर 2025 से 1 नवंबर 2025 – उड़द की डाल और उससे बनी चीजों का त्याग हिंदू शास्त्रों के अनुसार ऐसी मान्यता है की अगर कोई व्यक्ति इन 4 चीजों का त्याग करता है तो वह मोक्ष को प्राप्त करता है| चातुर्मास 2025 की तिथियाँ 6 जुलाई 2025 – देवशयनी एकादशी से 1 नवम्बर 2025 – देवउठनी एकादशी तक | इस साल चातुर्मास की शुरुआत 6 जुलाई 2025 (शनिवार) को हो चुकी है, देवशयनी एकादशी के दिन । यही वो दिन होता है जब माना जाता है कि भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। चातुर्मास चलेगा पूरे चार महीनों तक, और फिर 1 नवम्बर 2025 (शनिवार) को देवउठनी एकादशी के दिन भगवान पुनः जागेंगे। इन्हीं दो एकादशियों के बीच का समय “चातुर्मास” कहलाता है। चातुर्मास मे क्या नहीं करना चाहिए? यह जानने से पहले की चातुर्मास मे क्या क्या करना चाहिए | यह जानना आवश्यक है की क्या क्या नहीं करना चाहिए? शस्त्रों में चातुर्मास को भक्ति के लिए श्रेष्ठ महिमा बोल जाता है | इसलिए चातुर्मास मे सिर्फ भक्ति करनी चाहिए और यह कार्य नहीं करने चाहिए:- विवाह, मुंडन, ग्रहप्रवेश, नया व्यापार आदि | मांस, शराब, प्याज-लहसुन, अधिक नमक-मिर्च का सेवन | अनैतिक संबंध, अत्यधिक सुख साधन | बाल कटवाना, दाड़ी बनवाना, (विशेषकर ब्रह्मचारियों और साधकों के लिए) | चातुर्मास संयम, व्रत, और त्याग का होता है इसलिए इंद्रिय भोग के विषयों को करना वर्जित होता है |  अगर आप इस विषय के बारे मे और ज्यादा जानना चाहते हैतो आप  Astrologer Rajat Kumar से संपर्क कर सकते हैं | चातुर्मास मे कोई भीम शुभ कार्य क्यों नहीं किए जाते है? शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास को देवी-देवताओं का विश्राम काल कहा गया है | और विशेषकर भगवान विष्णु योगनिंद्रा में चले जाते है | जब देवता गण की निंद्रा में हो तो यह काल उचित कैसे मन जा सकता है किसी भी शुभ काम के लिए | क्योंकि जब भी हम कोई शुभ कार्ये करते हैं तो सबसे पहले देवी-देवता और भगवान की पूजा की जाती है | यही कारण है कि इस काल में विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण जैसे मंगल कार्य नहीं किए जाते हैं। इसके अलावा वर्षा ऋतु भी एक कारण है | क्योंकि वर्षा होने की वजह से रास्ते खराब हो जाते है और लोगों को आने जाने मे काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है | इसलिए ही साधुजन और संत भी इस मास यात्रा नहीं करते है |   चातुर्मास मे क्या करने से लाभ मिलेगा? चातुर्मास पवित्र मास होते है | इनमे भक्ति, दान, संयम, और ताप का विशेष महत्व होता है: हर सोमवार भगवान शिव की पूजा व व्रत करना चाहिए | एकादशी का व्रत रखें व विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें | नवदुर्गा, श्रीरामचारितमानस, श्रीमदभगवद्गीता का पाठ करें | तुलसी मत जी पूजा करें, दीपदान करे और जितना हो सके उतना जप और तप करना चाहिए | ब्राह्मणों को भोजन करना चाहिए और गए की सेवा करनी चाहिए | चातुर्मास मे राशियों के अनुसार कुछ विशेष सावधानियाँ मेष/वृश्चिक: क्रोध करने और जल्दबाजी करने से बचे | हनुमान जी की पूजा करें | वृष/तुला: ग्रह क्लेश मे न पड़े और मत लक्ष्मी की नियमानुसार पूजा करे | मिथुन/कन्या: मान भटक सकता है इसलिए मानसिक शांति हेतु ध्यानज करें | कर्क/मीन: शिव जी का अभिषेक करना लाभकारी होगा | सिंह/धनु: भगवान का ध्यान, सत्संग और साधुयों की सेवा मे मान लगाएं | मकर/कुंभ: शनिदेव का मंत्रों का जप करे और अपने कार्यों को मान लगाकर करे | अगर आप इस विषय के बारे मे और ज्यादा जानना चाहते है तो आप  Astrologer Rajat Kumar से संपर्क कर सकते हैं | चातुर्मास में ग्रह दोष शांति के उपाय:- इसमे ग्रह दोष आपकी जन्म कुंडली के अनुसार बताया गया है:- गुरु दोष – हार ब्रहस्पतिवार को व्रत रखे और भगवान विष्णु की पूजा करें | शनि दोष: सरसों के तेल का दान करे और हनुमान चालीसा का पाठ करें | राहु–केतु दोष: श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करें | मंगल दोष: हर मंगलवार उपवास करें और निष्काम भाव से हनुमान जी की सेवा करें |  यह काल बाहरी दुनिया से हटकर साधन और शुद्ध भक्ति का समय है | हमे अपने अंदर के लोभ, मोह, लालच, क्रोध सबको अलग हटकर सिर्फ और सिर्फ भगवान की पूजा और अपने कर्मों को सही करने का प्रयास करना चाहिए तब ही हम चातुर्मास का पूरा फल प्राप्त कर पाएंगे |  अगर आप कुछ पूछना चाहते है तो आओ कमेन्ट करके पूछ सकते है और ज्यादा जानकारी के लिए आप The Astrology Academy of India  से संपर्क कर सकते है |

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श्रावण मास मे चंद्रमा का प्रभाव

श्रावण मास में चंद्रमा का प्रभाव और उपाय – जानें शिव की कृपा कैसे पाएं?

श्रावण मास में चंद्रमा का प्रभाव और उपाय – जानें शिव जी की कृपा कैसे पाएं? क्या आपको पता है की श्रावण मा क्या होता है और इसका क्या महत्व है? पूजा हम और भी डीन्ज kरते है लेकिन इसी महीने गहरी शांति क्यों मिलती है?  श्रावण मास हिन्दू पंचांग के हिसाब से एक पवित्र और ऊर्जावान समय होता है | यह समय सिर्फ धार्मिक रीति रिवाजों का नहीं होता है बल्कि यह हमारी आत्मा को भी शांति और सुकून देने वाला महिना है | खासकर भगवान शिव और चंद्रमा का जो रिश्ता है, वह श्रावण मास को और भी ज्यादा रहस्यमयी और महत्वपूर्ण बनाता है | इस ब्लॉग से आपको पता चलेगा की चंद्रमा का संबंध श्रावण मास के साथ और कैसे इस मास ज्योतिषीय रूप से हम अपने जीवन को संतुलित कर सकते है | जानिए श्रावण मास क्या है? और इसका महत्व   श्रावण मास हिंदू कैलेंडर के हिसाब से  पाँचवा महिना होता है | जो जुलाई से अगस्त के बीच आता है | अक्सर इस महीने को लोग भगवान शिव का प्रिय महिना भी बोलते है और इस महीने को भगवान शिव को समर्पित करते है | धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को शिव जी ने अपने कंठ में रोक लिया था, इसलिए उन्हें नीलकंठ कहा गया | ऐसा माना जाता है की उस समय देवताओं ने श्रावण मास में जलाभिषेक करके उन्हें शीतलता प्रदान की थी | इसलिए ही इस महीने में सोमवार का व्रत, रुद्राभिषेक, शिव जी की पूजा, बेल पत्र अर्पण आदि विशेष महत्व रखते हैं  | ये सारे कार्य  हमारे जीवन के मानसिक, आध्यात्मिक और ग्रहों से जुड़े संतुलन को सुधारते हैं | शिव और चंद्रमा का गहरा संबंध जब भी हम भगवान शिव के विग्रह या तस्वीर को देखते है तो, उनके मस्तक पर चमकता हुआ चंद्रमा हमें शांति काअ एहसास है | काफी बार ऐसा भी देखा गया है की जब कोई बहुत दुखी और इस महीने भगवान शिव के मंदिर जाए तो उन्हे शांति मिलती है और उन्हे Solution मिल जाता है | यह कोई केवल प्रतीकात्मक बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा ज्योतिषीय रहस्य छिपा है |   “चंद्रमा को मन का स्वामी कहा गया है | शिव को ‘अंतर्मन’ का अधिपति माना जाता है | यही वजह है कि दोनों का संबंध बहुत गहरा और रहस्यमयी माना जाता है |” चंद्रमा के पास 16 कलायें हैं, और भगवान शिव ही उन 16 कलाओं को नियंत्रित करने वाले आदि तत्त्व हैं| जब हमारा चंद्रमा कमजोर होता है — यानी हम मानसिक रूप से अशांत, डरपोक या उलझे हुए होते हैं — भगवान शिव की साधना से हमें मानसिक शक्ति मिलती है| चंद्रमा – मन, भावना और मानसिक ऊर्जा का ग्रह ज्योतिष में चंद्रमा को हमारे मन, भावनाओं और स्मृतियों का प्रतीक माना गया है |  यह हमारे भीतर की नर्म संवेदनाओं, मां से जुड़े रिश्ते और मानसिक संतुलन को गहराई से प्रभावित करता है | कुंडली में अगर चंद्रमा कमजोर हो जाए या शनि, राहु या केतु जैसे ग्रहों की दृष्टि या युति से प्रभावित हो जाए, तो इंसान के भीतर बेचैनी, तनाव, उलझन या आत्मविश्वास की कमी पैदा हो सकती है | ऐसे लोग कई बार छोटी-छोटी बातों में डूब जाते हैं या निर्णायक फैसले नहीं ले पाते| असल में, चंद्रमा की चाल और उसकी दशा हमारे रोजमर्रा के अनुभवों पर साफ असर डालती है | यह हमारी सोच, नींद की गहराई और आत्मविश्वास की स्थिति तक को बदल सकता है | इसीलिए, चंद्रमा की ऊर्जा को साफ-सुथरा रखना और इसे संतुलित करना बेहद जरूरी माना गया है |  हिंदू परंपरा में श्रावण मास को चंद्रमा की शुद्धि और मानसिक शांति के लिए खास पवित्र समय माना जाता है| इस माह में भगवान शिव की उपासना, रुद्राभिषेक, जल अर्पण और चंद्रमा के मंत्रों का जाप करने से चित्त को स्थिरता और ताजगी मिलती है | अगर जीवन में तनाव या असमंजस बढ़ने लगे, तो चंद्रमा की साधना से मन को एक नई रोशनी मिलती है | जो भीतर से संभालने का हौसला देती है | यही वजह है कि चंद्रमा से जुड़ी पूजा-पद्धतियां आज भी लोगों के बीच इतनी लोकप्रिय हैं | श्रावण मास में चंद्रमा का प्रभाव क्यों विशेष होता है? श्रावण का महीना हर साल खासा महत्व रखता है | यह वो समय होता है जब प्रकृति भी हरियाली से भर जाती है और वातावरण में एक अलग सी पवित्रता महसूस होती है | इसी महीने में सोमवार का महत्व और बढ़ जाता है | कई लोग मानते है कि सोमवार को चंद्रमा की ऊर्जा सबसे अधिक सक्रिय रहती है | मान्यता है की, जब हम इस दिन भगवान शिव का जलाभिषेक या रुद्राभिषेक करते हैं, तो हमारा मन चंद्रमा की शुद्ध और शांत ऊर्जा से जुड़ता है | यही ऊर्जा हमारे विचारों और भावनाओं को स्थिर और सकारात्मक बनाती है | श्रावण के दौरान अक्सर चंद्रमा की युति बृहस्पति जैसे शुभ ग्रहों से होती है | ऐसी स्थिति में गजकेसरी योग जैसे फलदायी योग बनते हैं, जिनका असर सीधा हमारे आत्मविश्वास और मानसिक स्पष्टता पर पड़ता है | अगर कोई निर्णय लेने में हिचकिचाहट महसूस कर रहा हो, तो इस योग के दौरान साधना करने से मन मजबूत होता है | इस महीने की अमावस्या और पूर्णिमा की तिथियां भी बहुत खास मानी जाती हैं | उस समय सूर्य और चंद्रमा की विशेष स्थिति से वातावरण में आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ जाती है | ध्यान, जप या मंत्र साधना के लिए यह दिन सबसे उत्तम होते हैं | कई लोग मानते हैं कि श्रावण सोमवार को शिव पूजा से न सिर्फ आध्यात्मिक उन्नति होती है, बल्कि मन भी गहरे स्तर पर शांत और सुकून से भर जाता है | यही वजह है कि इस मास में शिवालयों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है, और घर-घर में व्रत और अभिषेक का संकल्प लिया जाता है | मन को शांत करने के लिए चंद्रमा से जुड़े उपाय अगर मन अशांत हो जाए और सोच उलझ जाए, तो कुछ आसान उपाय आपका सहारा बन सकते हैं श्रावण के सोमवार को उपवास रखें और जल में केवड़ा,

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विवाह मे ग्रहों का असर ज्योतिशिये गणना

विवाह में ग्रहों का असर

विवाह में ग्रहों का असर – ज्योतिषीय गणना विवाह मे ग्रहों का असर जानने से पहले यह समझना आवश्यक है की विवाह शब्द का वास्तविक अर्थ क्या होता है | असल में विवाह या शादी  शब्द सुनने में मामूली लगता है | लेकिन यह बस दो लोगो का साथ नही होता है, यह तो दो आत्माओं का मिलन होता है | विवाह बहुत पवित्र रस्म होती है और साथ ही हमारे शास्त्रों में विवाह को ‘संस्कार’ कहा गया है |  क्योंकि यह एक ऐसा बंधन है जो जन्मों तक साथ निभाने का वचन देता है | इसके अलावा यह सिर्फ सामाजिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि आत्मिक, मानसिक और भावनात्मक स्तर पर जुड़ाव है। जब दो लोग विवाह के बंधन मे बंधते है तो वो दोनों सिर्फ रिश्तेदार नहीं बनते, बल्कि एक-दूसरे के कर्मों के भागीदार भी बनते है | विवाह मे ग्रहों के असर से फरक पड़ता है इसलिए विवाह  मे ग्रहों का असर जानना अति आवश्यक होता है  कुंडली मे विवाह से जुड़ी भूमिका :- जानिए विवाह मे ग्रहों का असर साथ ही, विवाह हर व्यक्ति के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ होता है | कुंडली से इसका पूर्व अनुमान लगाया जा सकता है| इसी  तरह, व्यक्ति की जन्म कुंडली में 7वाँ भाव (House of Marriage) विवाह का प्रमुख कारक होता है | इसके स्वामी ग्रह की स्थिति, उस पर शुभ या अशुभ ग्रहों की दृष्टि, और शुक्र व गुरु जैसे ग्रहों की भूमिका विवाह की दिशा और दशा तय करती है। अगर कुंडली में शुभ योग बने हों – जैसे गुरु या शुक्र की अच्छी स्थिति, सप्तम भाव में शुभ ग्रह हो, तो व्यक्ति को सुखद वैवाहिक जीवन प्राप्त होता है। इसके विपरीत यदि कुंडली में  मंगल दोष, राहू-केतु या शनि जैसे ग्रहों का प्रभाव होता है |  इसी वजह से विवाह मे देरी या कठिनाइयाँ आ सकती है | वहीं यदि मंगल दोष, राहु-केतु या शनि जैसे ग्रहों का प्रभाव हो, तो विवाह में विलंब या तनाव आ सकता है। इसलिए कुंडली के विवाह योगों को समझना, जीवन साथी चुनने से पहले ज़रूरी होता है।  अगर आप विवाह योग के बारे मे जानना चाहते हो तो Astrologer Rajat Kumar  से संपर्क कर सकते हो | शादी में में देरी और बाधाएँ: ज्योतिषीय कारण और विवाह मे ग्रहों का असर   कई बार ऐसा होता है की बार-बार रिश्ते टूटते हैं, या उम्र निकल जाने के बाद भी विवाह नहीं हो पाता | तो व्यक्ति खुद पर शक करता है | लेकिन वह यह नहीं समझ पाता की इसकी वजह हमारी कुंडली मे छिपी होती है | सप्तम भाव में अशुभ ग्रहों की स्थिति (जैसे शनि, राहु, केतु), मंगल दोष, या शुक्र का नीच होना विवाह में देरी और बाधा पैदा कर सकता है। उदाहरण के लिए  गुरु या सप्तम भाव का स्वामी कमजोर हो, या दशा-अंतर्दशा विवाह योग के अनुकूल न हो, तो विवाह में अनचाहा विलंब होता है | इसके अलावा , नवांश कुंडली में भी यदि संबंधों को दर्शाने वाले ग्रह पीड़ित हों, तो यह मानसिक उलझन और गलत निर्णयों की ओर ले जाता है। इसलिए, अगर विवाह मे बार-बार रुकावट आ रही हो, तो कुंडली की गहराई से जांच और उचित उपाय करवाना चाहिए | पति-पत्नी में मनमुटाव के ज्योतिषीय कारण शादी के बाद हालांकि सब कुछ ठीक हो तो लेकिन  कई  बार पति और पत्नी के बीच अनबन, दूरी या मनमुटाव बन जाता है | इसके पीछे सिर्फ व्यावहारिक कारण नहीं, बल्कि ज्योतिषीय कारण भी हो सकते है | अगर सप्तम भाव में अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो – जैसे शनि, राहु या केतु – तो यह रिश्तों में गलतफहमी, दूरियां और कठोरता पैदा कर सकते हैं। शुक्र (पति के लिए पत्नी का कारक) और गुरु (पत्नी के लिए पति का कारक) की नीच स्थिति या शत्रु ग्रहों से दृष्टि रिश्ते को प्रभावित करती है। इसी कारण से समझदारी से किया गया ज्योतिषीय विश्लेषण न सिर्फ कारण बताता है, बल्कि रिश्तों को जोड़ने के उपाय भी देता है। अगर आप भी ज्योतिष से मिलकर अपने बारे मे पूछना चाहते हो या विवाह मे ग्रहों का असर जानना चाहते हो,  तो Astrologer Rajat kumar  से संपर्क करें |  दाम्पत्य जीवन में तीसरे व्यक्ति का दखल (Extra-Marital Issues) जब भी विवाह के बीच कोई तीसरा आ जाए, तो रिश्ता अंदर से टूटने लगता है | ऐसे मामलों में, ज्योतिषी (Astrologer) महत्वपूर्ण संकेत देता है | यह ग्रह भटकाव और मोह-माया से जुड़े होते है | यदि नवांश कुंडली में शुक्र, चंद्र या सप्तमेश पीड़ित हो, तो व्यक्ति भावनात्मक रूप से असंतुष्ट रहता है और बाहर सुकून ढूंढ़ने की प्रवृत्ति बन जाती है।नतीजतन ऐसे योग में विवाह के बाहर संबंध बनने की संभावना अधिक होती है, और रिश्ते में अविश्वास उत्पन्न होता है।इसलिए समय रहते समाधान करना आवश्यक है, वरना यह केवल शादी नहीं, आत्मा को भी तोड़ देता है। संतान संबंधी समस्याएँ और ग्रहों की भूमिका संतान सुख जीवन के सभी सुखों मे सबसे श्रेष्ठ सुख होता है, खासकर संतान सुख जीवन को पूर्णता देता है, लेकिन जब यह सुख नहीं मिल पाता तो मानसिक, सामाजिक और वैवाहिक दबाव बढ़ जाता है | ज्योतिष में पंचम भाव संतान से जुड़ा होता है। यदि विशेष रूप से  पंचम भाव में राहु, केतु, शनि या मंगल जैसे ग्रह स्थित हों, या पंचमेश कमजोर हो, तो संतान से जुड़ी बाधाएं आ सकती हैं।उदाहरण के लिए, संतान में देरी, गर्भपात या संतान न होना – ये सभी संकेत कुंडली में स्पष्ट दिखाई देते हैं। इस स्थिति में, ज्योतिषीय उपायों से संतान प्राप्ति की संभावना को बढ़ाया जा सकता है — जैसे संतान गोपाल मंत्र, विशेष व्रत और ग्रह शांति। तलाक, अलगाव और कोर्ट केस – चेतावनी संकेत अक्सर कई बार जब पति और पत्नी के बीच मे नहीं बनती है और जब विवाह का रिश्ता कोर्ट तक पहुँच जाय, तो यह सिर्फ कानूनी नहीं रह जाता है, बल्कि आत्मिक संघर्ष बन जाता है | खासकर ज्योतिष में सप्तम भाव में क्रूर ग्रहों (जैसे मंगल, शनि, राहु) का प्रभाव पति-पत्नी के बीच हिंसा, मतभेद और दूरी ला सकता है। इसके अतिरिक्त, अगर शुक्र  और चंद्र कोमल ग्रह पीड़ित हों, तो भावनात्मक जुड़ाव कमजोर हो जाता है और झगड़े बद जाते

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